सुंदर विचार

 

 🙏आओ चले शिव की ओर🙏👏



 1. हम सब शिव के ही अंश है जो शिव में है वह हमें भी है। शिष्य भाव सभी प्राणियों में समय अनुकूल ही आती है। जब हम अपने आपको शिष्य समझते हैं तो शिष्य भाव स्वाभाविक आने लगती है।


2. मंजिल पाने की चाहत में मंजिल की ओर चल तो रहे है। अर्थात शिव को पाने की चाहत में शिव की ओर चल तो रहे हैं। एक ना एक दिन मंजिल पाने की चाहत पूरी हो जाएगी।


3. साकार और निराकार स्थिति के चक्कर में नहीं फसना है, आपको जिस रूप में देखना चाहते हैं आप उन्हें याद कर सकते हैं, क्यों थी शिव ही समस्त रूपों का विश्व मूर्ति स्वरूप है।


4. लौकिक जीवन में पारलौकिक को शामिल करते हैं तो जीवन सुंदर हो जाएगा लेकिन पर लौकिक जीवन में लौकिक जगत की बात करते हैं तो वहां राजनीतिक और कूटनीति शुरू हो होगी।


5. जो लोग नमः शिवाय से अपने गुरु को प्रणाम करते हैं तो शिव के सहस्त्र रूपों को प्रणाम करते हैं, क्योंकि नमः शिवाय मंत्र से बड़ा कोई मंत्र है ही नहीं। क्योंकि शिव देवों के देव महादेव है नमः शिवाय मंत्र से सभी देवता गण शिव को प्रणाम करते हैं और मां भगवती इस मंत्र से  खुश होती है।


6. हे ! महेश्वर तुम्हें जानना, समझना और पहचानना अनु मानस की सीमा से बाहर की बात है, लेकिन तुम जैसी भी हो तुम्हें बारंबार प्रणाम है। तुम सदाशिव के रूप में इच्छा ज्ञान क्रिया चित और आनंद के अथाह  सागर हो। अध्यात्म में हम- सब शिष्य अग्रसर होते रहेंगे।


7. हम सभी अपने जीवन काल में कई गुरुओं से ज्ञान सीखते हैं, क्योंकि जैसे- जैसे हमारी सीखने की इच्छा बढ़ती है वैसे- वैसे हम अपने जीवन में नए गुरु की खोज करते हैं।


8. शिव गुरु अपने शिष्य का कभी भी परीक्षा नहीं लेते हैं, अगर गुरु शिष्य का परीक्षा लेने लगे तो इस जगत में कोई भी व्यक्ति उनकी परीक्षाओं में उत्तीर्ण ( पास ) नहीं हो सकता। अपने कर्मों के कारण व्यक्ति को स्वयं दुख होता है।


9. सहज प्रेम का अर्थ - जो दूसरे प्रेम के साथ में जुड़ा हुआ है। मनुष्य के सहज प्रेम से ही परमात्मा लभय होते हैं अर्थात खुश होते हैं।


10. हमें दूसरे व्यक्ति के लिए दया नहीं मांगना है । उसकी स्थिति को देखते हुए ही दया मांग सकते है।दूसरे व्यक्ति को दया मांगने के लिए सिखानी है, उन्हें बतानी है कि स्वयं के लिए खुद ही अपने गुरु से दया मांगे।


11. इस कोविड-19 की महामारी में जो इस त्रासदी के माहौल में हमें अपने गुरु से लगातार मनसा, वाचना, कर्मणा अपने गुरु से दया की याचना और अपने गुरु को निरंतर नमः शिवाय से प्रणाम करने की क्रिया में लगे रहना है।🙏🙏🙏🙏🙏🌹🌹🌹

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