शिव का पंचानन स्वरूप.?


शिव का पंचानन स्वरूप:- पंचानन शब्द का अर्थ पांच आनन से है
 आनन का अर्थ होता है:-मुख अर्थात पंचमुख (पांच मुंह वाला )महादेव वास्तव में शिव गुरु के रूप में पांच शक्तियों का उपयोग करते हैं :-इक्षा ,ज्ञान क्रिया, चित और आनंद इसलिए उन्हें पंचानन कहा जाता है ।
ग्रंथों में पांचों मुख के अलग-अलग नाम दिए गए हैं ।
इन नामों में भिन्नता भी है।वैसे यह नाम हैं 
सघोजत, तत्पुरुष, वामदेव अघोर एवं ईशान। 
सघोजात शब्द का अर्थ होता है -'अभी का जन्मा हुआ 'तत्पुरुष -'वह पुरुष',वामदेव -'उल्टा करने वाला'यानी (विनाश करने वाला ),अघोर -'जो घोर नहीं होता'( जहां तरंगे नहीं हैं जो क्षुब्द नहीं होता है) 


ईशान -'उत्तर-पूर्व '।वर्णन आया है कि ये पांच शक्तियां सृष्टि ,स्थिति ,संहार ,तिरोभाव और अनुग्रह हैं। इन पाँच शक्तियों को इस प्रकार भी उपाधियुक्त किया जा सकता है :-इक्षा ,ज्ञान ,क्रिया ,चित् एवं आनंद।
 आदि गुरु शंकराचार्य ने ठीक ही कहा है :-"नमस्ते नमस्ते विभो विश्वमूर्ति ।
नमस्ते नमस्ते चिदानंद मूर्ति "।।आप जानते हैं
 ईश्वर को सच्चिदानंद कहा जाता है ।
सच्चिदानंद में तीन शब्द हैं सत् , चित् और आनंद सत् का अर्थ होता है- नित्य अर्थात जिस में कभी भी कोई परिवर्तन नहीं होता है ।
चित का अर्थ होता है -ज्ञान और आनंद का अर्थ होता है- जहां इच्छा करने की स्वतंत्रता हो ।
शिव ईश्वर का नाम है 
किंतु गुरु रूप में वह सत् की शक्ति का सुषुप्ता का अवस्था में रखते हैं 
क्योंकि गुरु शिष्य के प्रति सापेक्ष है और ईश्वर के रूप में समभाव में रहते हैं। गुरु सृष्टि के प्रति समभाव में नहीं हो सकते। परमात्मा का गुण समभाव का है। 
वह रोगी भी होता है और चिकित्सक के रूप में चिकित्सा भी करते हैं ।आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा शिव की स्तुति में सच्चिदानंद शब्द का प्रयोग नहीं किया गया है
 बल्कि वे कह रहे हैं "नमस्ते नमस्ते चिदानंद मूर्ति "।उनके द्वारा सत् शब्द का प्रयोग छोड़ दिया गया है। जबकि इसके पूर्व की पंक्ति में शंकराचार्य शिव को" विभो विश्वमूर्ति "कहते हैं । 
ईश्वर रूप में शिव समभाव में हैं 
अतएव शंकराचार्य 'सत 'शब्द का प्रयोग नहीं कर रहे हैं ।
ग्रंथों में पंचानन शिव को' गुरु शिव 'और 'तांत्रिक शिव 'भी कहा गया है।

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