पूजा क्या है.?

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Sahab shree harindranand ji

पुजा, प्रेम को कहते हैं । और प्रेम की अवस्था में सोच किसी एक केंद्र बिंदु पर ठहरती है .। जो की टुटेगी नही ।
अब आते है गुरू चर्चा मे .....
ज्यों ही हम और आप गुरू की बात करते हैं तो हमारी मानसिक पटल मे शिव की छवी आती है ( वो छवी जैसा भी हो ) ।
प्रेम मे भी यही होता है ....
एक माँ का बच्चा दिल्ली गया हुआ है ,वो माँ धर से ही उस बच्चे को बार बार याद कर रही है। यहाँ यह अवस्था माँ का बच्चे के साथ  प्रेम की अवस्था कहलाती है ।
हम और आप गुरू चर्चा मे भी इस उदाहरण को देख सकते हैं ।
और सही मायने मे यह कहा जा सकता है कि शिव की शिष्यता मे ही वास्तविक पुजा हो रही है ।
मीरा कभी कृष्ण को अगरबती नही दिखाई ...वो तो गली गली गुनगुनाने ....मीरा रानी दीवानी कहलाने लगी ।
यह है प्रेम .....
प्रेम तो खुद को समर्पित करने की अवस्था है .....
प्रेमी अपने प्रेम पात्र की गुणगान करता है .... यह प्रेमी का नीयम नही,प्रेम का नीयम है ।
गुरू की चर्चा मे भी तो यही हो रहा है।
एक बड़ी सी बात जो आपने कहीं कहीं पूजा मतलब होता प्रेम ,आप किसी देवी देवता का पूजा करिए जैसे जैसे उनसे हमारा आपका प्रेम होने लगेगा तो हमारा आपका मन उनकी और चलेगा ,और प्रेम का मतलब ही होता है जिनसे होगा उनकी और चलेगा यहि बाते शिव गुरु की चरचा में होती है यहाँ सहजता से सरलता से व्यक्ति का मन अपने आराध्य की तरफ जाने लगता है।
और पूजा  में प्रवाह होती है जो सामान्यतः पूजा करने वाले नहीं देखी जाती लेकिन शिव शिष्य के यह देखी जा रही है।
और सच पुछिए तो सही पूजा तो शिव शिष्य के द्वारा ही हो रही है ना  जहाँ केवल प्यार है व्यापार नहीं ।
केवल एक विषय पर कि शिव  हमारे गुरु हैं और आपके भी हो सकते हैं।ईश्वर से प्रेम का इससे सरल और सहज विधा हो ही नहीं सकता
साहब बोल रहे थे कि यही एक काम है जो हमसे और आपसे नही होने वाला था ।इसलिए गुरू ने इस काम को दिया हमे करने के लिए।
बाकी काम स्वत: होने वाला है इसलिए और कुछ गुरू ने नही कहा ।
एक बीज और उसी का पौधा और उस पौधे का विशाल रूप ( पेड) को देख सकते हैं।
मनुष्य की इच्छा ,सोच या विचार अंकुरित बीज की तरह होता है जो हो भी सकता है या परस्थिती वश नही भी हो सकता है । 
ये प्रथम चरण होता है ।
ज्यो ही अंकुरित बीज पौधा का रूप लेता है ,यहाँ भी वो पेड हो सकता है या नही भी । परिस्थिति हो सकता है उसे बढने ना दे । यह दुसरा चरण है यानी की भाव की अवस्था ...जो टुट भी सकता है।
और तीसरा है प्रेम .....उस बीज का पेड का रूप ले लेना । जो अडिग हो ...
ज्यो ही शिव को गुरू मानते हैं 
यह विचार के तल मे उत्पन सोच है ....फिर धीरे धीरे यह सोच धनी भुत होकर भाव की स्थिती मे जाता है क्रमशः गुरू आदेशीत कर्म करने से ।
 भाव टुट भी सकता है ।
जब यह भाव प्रबल आवेश मे हो तो यह प्रेेम कहलाता है। जो अडिग होता है । बैचेनी, तडप ,ततरप होती है।

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